ग़ज़ल
भाई रे! ऐसा पंथ हमारा
भाई रे! ऐसा पंथ हमाराद्वै पख रहितपंथ गह पुरा अबरन एक अघाराबाद बिबाद काहू सौं नाहीं मैं हूँ जग से न्यारासमदृष्टि सूं भाई सहज में आपहिं आप बिचारामैं,तैं,मेरी यह गति नाहीं निरबैरी निरविकराकाम कल्पना कदै न कीजै पूरन ब्रह्म पियाराएहि पथि पहुंचि पार गहि दादू, सो तब सहज संभारा
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