ग़ज़ल
कोइ जान रे मरम माधइया केर
कोइ जान रे मरम माधइया केरौ।कैसें रहै करै का सजनी प्राण मेरौ॥टेक॥
कौण बिनोद करत री सजनी, कौणनि संग बसेरौ।संत-साध गति आये उनके करत जु प्रेम घनेरौ॥१॥
कहाँ निवास बास कहँ, सजनी गवन तेरौ।घट-घट माहैं रहै निरंतर, ये दादू नेरौ॥२॥
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