ग़ज़ल
क्या लुत्फ़-ए-सितम यूँ उन्हें हासिल नहीं होता
क्या लुत्फ़-ए-सितम यूँ उन्हें हासिल नहीं होताग़ुँचे को वो मलते हैं अगर दिल नहीं होता
कुछ ताज़ा मज़ा शौक़ का हासिल नहीं होताहर रोज़ नई आँख, नया दिल नहीं होता
जिस आइने को देख लिया, क़हर से उसनेउस आइने से कोई मुक़ाबिल नहीम होता
ग़म्ज़ा भी हो शफ़्फ़ाक़, निगाहें भी हों ख़ूँरेज़तलवार के बाँधे से तो क़ातिल नहीं होता
इन्कार तो करते हो मगर यह भी समझ लोबेवजह किसी से कोई साइल नहीं होता
मंज़िल पे जो पहुँचे तो मोले क़ैस को लैलानाके से जुदा क्या कभी महमिल नहीं होता
मरने ही पे जब आए तो क्या डूब के मरियेक्या ख़ाक में मिल जाने को साहिल नहीं होता
यह दाद मिली उनसे मुझे काविश-ए-दिल कीजिस काम की आदत हो मुश्किल नहीं होता
ऐ ‘दाग़’ किस आफ़त में हूँ, कुछ बन नहीं आतीवो छीनते हैं मुझसे जुदा दिल नहीं होता
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