ग़ज़ल
तेरी महफ़िल में यह कसरत कभी थी
तेरी महफ़िल में यह कसरत कभी थीहमारे रंग की सोहबत कभी थी
इस आज़ादी में वहशत कभी थीमुझे अपने से भी नफ़रत कभी थी
हमारा दिल, हमारा दिल कभी थातेरी सूरत, तेरी सूरत कभी थी
हुआ इन्सान की आँखों से साबितअयाँ कब नूर में जुल्मत कभी थी
दिल-ए-वीराँ में बाक़ी हैं ये आसारयहाँ ग़म था, यहाँ हसरत कभी थी
तुम इतराए कि बस मरने लगा ‘दाग़’बनावट थी जो वह हालत कभी थी.
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