ग़ज़ल
ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया
ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गयाझूठी क़सम से आप का ईमान तो गया
दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहींउल्टी शिकायतें रही एहसान तो गया
अफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो जिल्लतें हुईंलेकिन उसे जता तो दिया, जान तो गया
देखा है बुतकदे में जो ऐ शेख कुछ न पूछईमान की तो ये है कि ईमान तो गया
डरता हूँ देख कर दिल-ए-बेआरज़ू को मैंसुनसान घर ये क्यूँ न हो मेहमान तो गया
क्या आई राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार मेंवो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया
गो नामाबर से कुछ न हुआ पर हज़ार शुक्रमुझको वो मेरे नाम से पहचान तो गया
बज़्म-ए-उदू में सूरत-ए-परवाना मेरा दिलगो रश्क़ से जला तेरे क़ुर्बान तो गया
होश-ओ-हवास-ओ-ताब-ओ-तवाँ 'दाग़' जा चुकेअब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया
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