ग़ज़ल

बुतान-ए-माहवश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं

दाग़ देहलवी · सब कलाम देखें
बुतान-ए-महविश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैंकि जिस की जान जाती है उसी के दिल में रहते हैं
हज़ारों दाग़ पिन्हाँ आशिक़ों के दिल में रहते हैंशरर पत्थर की सूरत उन की आब-ओ-गिल में रहते हैं
ज़मीं पर पाँव नफ़रत से नहीं रखते परी-पैकरये गोया इस मकाँ की दूसरी मंज़िल में रहते हैं
मोहब्बत में मज़ा है छेड़ का लेकिन मज़े की होहज़ारों लुत्फ़ हर इक शिकवा-ए-बातिल में रहते हैं
ख़ुदा रक्खे सलामत जिन को उन को मौत कब आएतड़पते लोटते हम कूचा-ए-क़ातिल में रहते हैं
हज़ारों हसरतें वो हैं कि रोके से नहीं रुकतींबहुत अरमान ऐसे हैं कि दिल के दिल में रहते हैं
यहाँ तक थक गए हैं चलते चलते तेरे हाथों सेकि अब छुप छुप के नावक सीना-ए-बिस्मिल में रहते हैं
न देखे होंगे रिंदों से भी तू ने पाक ऐ ज़ाहिदकि ये बे-दाग़ मय-ख़ाने की आब-ओ-गिल में रहते हैं
मुहीत-ए-इश्क़ की हर मौज तूफ़ाँ-ख़ेज़ ऐसी हैवो हैं गिर्दाब में जो दामन-ए-साहिल में रहते हैं
ख़ुदा रक्खे मोहब्बत ने किए आबाद दोनों घरमैं उन के दिल में रहता हूँ वो मेरे दिल में रहते हैं
जो होती ख़ूब-सूरत तो न छुपती क़ैस से लैलामगर ऐसे ही वैसे पर्दा-ए-महमिल में रहते हैं
हमारे साए से बचता है हर इक बज़्म में उस कीहमें देखो कि हम तन्हा भरी महफ़िल में रहते हैं
सुराग़-ए-मेहर-ओ-उल्फ़त ग़ैर के दिल में न पाएँगेअबस वो रात दिन इस सई-ए-बे-हासिल में रहते हैं
बुतों को महरम-ए-असरार तू ने क्यूँ किया या रबकि ये काफ़िर हर इक ख़ल्वत-सरा-ए-दिल में रहते हैं
फ़लक दुश्मन हुआ गर्दिश-ज़दों को जब मिली राहतज़ियादा राह से खटके मुझे मंज़िल में रहते हैं
तन-आसानी कहाँ तक़दीर में हम दिल-गिरफ़्तों कीख़ुदा पर ख़ूब रौशन है कि जिस मुश्किल में रहते हैं
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh