ग़ज़ल
जवानी गुज़र गयी
क्या कहिये किस तरह से जवानी गुज़र गईबदनाम करने आई थी बदनाम कर गई ।
क्या क्या रही सहर को शब-ए-वस्ल की तलाशकहता रहा अभी तो यहीं थी किधर गई ।
रहती है कब बहार-ए-जवानी तमाम उम्रमानिन्दे-बू-ए-गुल इधर आयी उधर गई ।
नैरंग-ए-रोज़गार से बदला न रंग-ए-इश्क़अपनी हमेशा एक तरह पर गुज़र गई ।
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