ग़ज़ल

आफत की शोख़ियां हैं

दाग़ देहलवी · सब कलाम देखें
आफत की शोख़ियां है तुम्हारी निगाह मेंमेहशर के फितने खेलते हैं जल्वा-गाह में..
वो दुश्मनी से देखते हैं देखते तो हैंमैं शाद हूँ कि हूँ तो किसी कि निगाह में..
आती है बात बात मुझे याद बार बारकहता हूं दोड़ दोड़ के कासिद से राह में..
इस तौबा पर है नाज़ मुझे ज़ाहिद इस कदरजो टूट कर शरीक हूँ हाल-ए-तबाह में
मुश्ताक इस अदा के बहुत दर्दमंद थेऐ दाग़ तुम तो बैठ गये एक आह में....
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh