ग़ज़ल

काबे की है हवस कभी कू-ए-बुतां की है

दाग़ देहलवी · सब कलाम देखें
काबे की है हवस कभी कू-ए-बुतां की हैमुझ को ख़बर नहीं मेरी मिट्टी कहाँ की है
कुछ ताज़गी हो लज्जत-ए-आज़ार के लिएहर दम मुझे तलाश नए आसमां की है
हसरत बरस रही है मेरे मज़ार सेकहते है सब ये कब्र किसी नौजवां की है
क़ासिद की गुफ्तगू से तस्ल्ली हो किस तरहछिपती नहीं वो जो तेरी ज़बां की है
सुन कर मेरा फ़साना-ए-ग़म उस ने ये कहाहो जाए झूठ सच, यही ख़ूबी बयां की है
क्यूं कर न आए ख़ुल्द से आदम ज़मीन परमौजूं वहीं वो ख़ूब है, जो शय जहाँ की है
उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं 'दाग़'हिन्दुस्तां में धूम हमारी ज़बां की है
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