ग़ज़ल
क्यों चुराते हो देखकर आँखें
क्यों चुराते हो देखकर आँखेंकर चुकीं मेरे दिल में घर आँखें
ज़ौफ़ से कुछ नज़र नहीं आताकर रही हैं डगर-डगर आँखें
चश्मे-नरगिस को देख लें फिर हमतुम दिखा दो जो इक नज़र आँखें
कोई आसान है तेरा दीदारपहले बनवाए तो बशर आँखें
न गई ताक-झाँक की आदतलिए फिरती हैं दर-ब-दर आँखें
ख़ाक पर क्यों हो नक्शे-पा तेराहम बिछाएँ ज़मीन पर आँखें
नोहागर कौन है मुक़द्दर पररोने वालों में हैं मगर आँखें
दाग़ आँखें निकालते हैं वोउनको दे दो निकाल कर आँखें
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