ग़ज़ल
अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होताकभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता
न मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ़ दोस्ती मेंकोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता
ये मज़ा था दिल्लगी का कि बराबर आग लगतीन तुम्हें क़रार होता न हमें क़रार होता
तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करतेअगर अपनी जिन्दगी का हमें ऐतबार होता
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