ग़ज़ल
कहाँ थे रात को हमसे ज़रा निगाह मिले
कहाँ थे रात को हमसे ज़रा निगाह मिलेतलाश में हो कि झूठा कोई गवाह मिले
तेरा गुरूर समाया है इस क़दर दिल मेंनिगाह भी न मिलाऊं तो बादशाह मिले
मसल-सल ये है कि मिलने से कौन मिलता हैमिलो तो आँख मिले, मिले तो निगाह मिले
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