ग़ज़ल
डरते हैं चश्म-ओ-ज़ुल्फ़, निगाह-ओ-अदा से हम
डरते हैं चश्म-ओ-ज़ुल्फ़, निगाह-ओ-अदा से हमहर दम पनाह माँगते हैं हर बला से हम
माशूक़ जाए हूर मिले, मय बजाए आबमहशर में दो सवाल करेंगे ख़ुदा से हम
गो हाल-ए-दिल छुपाते हैं पर इस को क्या करेंआते हैं ख़ुद ख़ुद नज़र इक मुबतला से हम
देखें तो पहले कौन मिटे उसकी राह मेंबैठे हैं शर्त बाँध के हर नक्श-ए-पा से हम
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