ग़ज़ल

ग़म से कहीं नजात मिले चैन पाएं हम

दाग़ देहलवी · सब कलाम देखें
ग़म से कहीं नजात मिले चैन पाए हमदिल ख़ूँ में नहाए तो गंगा नहाए हम
जन्नत में जाए हम कि जहन्नुम में जाए हममिल जाए तू कहीं न कहीं तुझ को पाए हम
मुमकिन है ये कि वादे पे अपने वो आ भी जाएमुश्किल ये है कि आप में उस वक्त आए हम
नाराज़ हो ख़ुदा तो करें बन्दगी से ख़ुशमाशूक़ रूठ जाए तो क्यों कर मनाए हम
सर दोस्तों के काट कर रक्खे हैं सामनेग़ैरों से पूछते हैं कसम किस की खाए हम
सौंपा तुम्हें ख़ुदा को चले हम तो नामुरादकुछ पढ़ के बख्शना जो कभी याद आए हम
ये जान तुम न लोगे अगर, आप जाएगीइस बेवफ़ा की ख़ैर कहां तक मनाए हम
हम-साए जागते रहे नालों से रात भरसोए हुए नसीब को क्यों कर जगाए हम
तू भूलने की चीज़ नहीं ख़ूब याद रखऐ 'दाग़' किस तरह तुझे दिल से भुलाए हम
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