ग़ज़ल
न बदले आदमी जन्नत से भी बैतुल-हज़न अपना
न बदले आदमी जन्नत से भी बैतुल-हज़न अपनाकि अपना घर है अपना और है अपना वतन अपना
जो यूँ हो वस्ल तो मिट जाए सब रंजो-महन अपनाज़बाँ अपनी दहनउनका ज़बाँ उनकी दहन अपना
न सीधी चाल चलते हैं न सीधी बात करते हैंदिखाते हैं वो कमज़ोरों को तन कर बाँकपन अपना
अजब तासीर पैदा की है वस्फ़े-नोके-मिज़गाँ नेकि जो सुनता है उसके दिल में चुभता है सुख़न अपना
पयामे-वस्ल,क़ासिद की ज़बानी और फिर उनसेये नादानी वो नाफ़हमी ये था दीवानापन अपना
बचा रखना जुनूँ के हाथ से ऐ बेकसो, उसकोजो है अब पैरहन अपना वही होगा क़फ़न अपना
निगाहे-ग़म्ज़ा कोई छोड़ते हैं गुलशने दिल कोकहीं इन लूटने वालों से बचता है चमन अपना
यह मौका मिल गया अच्छा उसे तेशा लगाने कामुहब्बत में कहीं सर फोड़ता फिर कोहकन अपना
जो तख़्ते-लाला-ओ-गुल के खिले वो देख लेते हैंतो फ़रमाते हैं वो कि ‘दाग़’ का ये है ये चमन अपना
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