ग़ज़ल

रंज की जब गुफ्तगू होने लगी

दाग़ देहलवी · सब कलाम देखें
रंज की जब गुफ्तगू होने लगीआप से तुम तुम से तू होने लगी
चाहिए पैग़ामबर दोने तरफ़लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू होने लगी
मेरी रुस्वाई की नौबत आ गईउनकी शोहरत की क़ू-ब-कू़ होने लगी
नाजि़र बढ़ गई है इस क़दरआरजू की आरजू होने लगी
अब तो मिल कर देखिए क्या रंग होफिर हमारी जुस्तजू होने लगी
'दाग़' इतराए हुए फिरते हैं आपशायद उनकी आबरू होने लगी
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