ग़ज़ल

उज्र् आने में भी है और बुलाते भी नहीं

दाग़ देहलवी · सब कलाम देखें
उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहींबाइस-ए-तर्क-ए मुलाक़ात बताते भी नहीं
मुंतज़िर हैं दमे रुख़सत के ये मर जाए तो जाएँफिर ये एहसान के हम छोड़ के जाते भी नहीं
सर उठाओ तो सही, आँख मिलाओ तो सहीनश्शाए मैं भी नहीं, नींद के माते भी नहीं
क्या कहा फिर तो कहो; हम नहीं सुनते तेरीनहीं सुनते तो हम ऐसों को सुनाते भी नहीं
ख़ूब परदा है कि चिलमन से लगे बैठे हैंसाफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
मुझसे लाग़िर तेरी आँखों में खटकते तो रहेतुझसे नाज़ुक मेरी आँखों में समाते भी नहीं
देखते ही मुझे महफ़िल में ये इरशाद हुआकौन बैठा है इसे लोग उठाते भी नहीं
हो चुका तर्के तअल्लुक़ तो जफ़ाएँ क्यूँ होंजिनको मतलब नहीं रहता वो सताते भी नहीं
ज़ीस्त से तंग हो ऐ दाग़ तो जीते क्यूँ होजान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं
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