ग़ज़ल

मुमकिन नहीं कि तेरी मुहब्बत की बू न हो

दाग़ देहलवी · सब कलाम देखें
मुमकिन नहीं कि तेरी मुहब्बत की बू न होकाफ़िर अगर हज़ार बरस दिल में तू न हो
क्या लुत्फ़े-इन्तज़ार जो तू हीला-जू न होकिस काम का विसाल अगर आरज़ू न हो
ख़लवत में तुझको चैन नहीं किसका ख़ौफ़ हैअन्देशा कुछ न हो जो नज़र चार-सू न हो
वो आदमी कहाँ है वो इन्सान है कहाँजो दोस्त का हो दोस्त अदू का अदू न हो
दिल को मसल-मसल के ज़रा हाथ सूँघियेमुमकिन नहीं कि ख़ूने-तमन्ना की बू न हो
ज़ाहिद मज़ा तो जब है अज़ाबो-सवाब कादोज़ख़ में बादाकश न हों जन्नत में तू न हो
माशूक़े-हिज्र इससे ज़ियादा नहीं कोईक्यों दिल्लगी रहे जो तेरी आरज़ू न हो
है लाग का मज़ा दिले-बेमुद्दआ के साथतुम क्या करो किसी को अगर आरज़ू न हो
ऐ ‘दाग़’ आ के फिर गए वो इसका क्या करेंपूरी जो नामुराद तेरी आरज़ू न हो
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