ग़ज़ल
ये जो है हुक़्म मेरे पास न आए कोई
ये जो है हुक़्म मेरे पास न आए कोईइसलिए रूठ रहे हैं कि मनाए कोई
ये न पूछो कि ग़मे-हिज्र में कैसी गुज़रीदिल दिखाने का हो तो दिखाए कोई
हो चुका ऐश का जलसा तो मुझे ख़त पहुँचाआपकी तरह से मेहमान बुलाए कोई
तर्के-बेदाद की तुम दाद न पाओ मुझसेकरके एहसान ,न एहसान जताए कोई
क्यों वो मय-दाख़िले-दावत ही नहीं ऐ वाइज़मेहरबानी से बुलाकर जो पिलाए कोई
सर्द -मेहरी से ज़माने के हुआ है दिल सर्दरखकर इस चीज़ को क्या आग लगाए कोई
आपने दाग़ को मुँह भी न लगाया, अफ़सोसउसको रखता था कलेजे से लगाए कोई
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