ग़ज़ल

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था

दाग़ देहलवी · सब कलाम देखें
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का थान था रक़ीबतो आख़िर वो नाम किस का था
वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैंये काम किस ने किया है ये काम किस का था
वफ़ा करेंगे ,निबाहेंगे, बात मानेंगेतुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था
रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहामुक़ीम कौन हुआ है मुक़ाम किस का था
न पूछ-ताछ थी किसी की वहाँ न आवभगततुम्हारी बज़्म में कल एहतमाम किस का था
हमारे ख़त के तो पुर्जे किए पढ़ा भी नहींसुना जो तुम ने बा-दिल वो पयाम किस का था
इन्हीं सिफ़ात से होता है आदमी मशहूरजो लुत्फ़ आप ही करते तो नाम किस का था
तमाम बज़्म जिसे सुन के रह गई मुश्ताक़कहो, वो तज़्किरा-ए-नातमाम किसका था
गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहेंख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था
अगर्चे देखने वाले तेरे हज़ारों थेतबाह हाल बहुत ज़ेरे-बाम किसका था
हर इक से कहते हैं क्या 'दाग़' बेवफ़ा निकलाये पूछे इन से कोई वो ग़ुलाम किस का था
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