ग़ज़ल

रामायण का एक सीन

बृज नारायण चकबस्त · सब कलाम देखें
रुखसत हुआ वो बाप से ले कर खुदा का नामराह-ए-वफ़ा की मन्ज़िल-ए-अव्वल हुई तमाममन्ज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतज़ामदामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलाम
इज़हार-ए-बेकसी से सितम होगा और भीदेखा हमें उदास तो ग़म होगा और भी
दिल को संभालता हुआ आखिर वो नौनिहालखामोश माँ के पास गया सूरत-ए-खयालदेखा तो एक दर में है बैठी वो खस्ता हालसकता सो हो गया है, ये है शिद्दत-ए-मलाल
तन में लहू का नाम नहीं, ज़र्द रंग हैगोया बशर नहीं, कोइ तस्वीर-ए-संग है
क्या जाने किस खयाल में गुम थी वो बेगुनाहनूर-ए-नज़र पे दीद-ए-हसरत से की निगाहजुम्बिश हुई लबों को, भरी एक सर्द आहली गोशाहाए चश्म से अश्कों ने रुख की राह
चेहरे का रंग हालत-ए-दिल खोलने लगाहर मू-ए-तन ज़बाँ की तरह बोलने लगा
आखिर, असीर-ए-यास का क़ुफ़्ले-दहन खुलाअफ़साना-ए-शदायद-ए-रंज-ओ-महन खुलाइक दफ़्तर-ए-मुज़ालिम-ए-चर्ख-ए-कुहन खुलावो था दहां-ए-ज़ख्म, के बाब-ए-सुखन खुला
दर्द-ए-दिल-ए-ग़रीब जो सर्फ़-ए-बयां हुआख़ून-ए-जिगर का रंग सुखन से अयां हुआ
रो कर कहा; खामोश खड़े क्यों हो मेरी जाँ?मैं जानती हूँ, किस लिये आये हो तुम यहाँसब की खुशी यही है तो सहरा को हो रवाँलेकिन मैं अपने मुँह से न हर्गिज़ कहूँगी "हाँ"
किस तरह बन में आँख के तारे को भेज दूँ?जोगी बना के राज दुलारे को भेज दूँ?
दुनिया का हो गया है ये कैसा लहू सफ़ेद?अंधा किये हुए है ज़र-ओ-माल की उम्मेदअंजाम क्या हुआ? कोई नहीं जानता ये भेदसोचे बशर, तो जिस्म हो लर्ज़ां मिसाल-ए-बेद
लिखी है क्या हयात-ए-अबद इन के वास्ते?फैला रहे हैं जाल ये किस दिन के वास्ते?
लेती किसी फ़क़ीर के घर में अगर जनमहोते न मेरी जान को सामान ये बहमडसता न साँप बन के मुझे शौकत-ओ-हशमतुम मेरे लाल, थे मुझे किस सल्तनत से कम
मैं खुश हूँ फूँक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज कोतुम ही नहीं, तो आग लगाऊँगी राज को
किन किन रियाज़तों से गुज़ारे हैं माह-ओ-सालदेखी तुम्हारी शक्ल जब ऐ मेरे नौ-निहाल!पूरा हुआ जो ब्याह का अरमान था कमालआफ़त आयी मुझ पे, हुए जब सफ़ेद बाल
छूटती हूँ उन से, जोग लें जिन के वास्तेक्या सब किया था मैने इसी दिन के वास्ते?
ऐसे भी नामुराद बहुत आयेंगे नज़रघर जिन के बेचिराग़ रहे आह! उम्र भररहता मेरा भी नख्ल-ए-तमन्ना जो बेसमरये जा-ए सबर थी, के दुआ में नहीं असर
लेकिन यहाँ तो बन के मुक़द्दर बिगड़ गयाफल फूल ला के बाग़-ए-तमन्ना उजड़ गया
सरज़ाद हुए थे मुझसे खुदा जाने क्या गुनाहमझधार में जो यूँ मेरी कश्ती हुई तबाहआती नज़र नहीं कोई अमन-ओ-अमां कि राहअब यां से कूच हो तो अदम में मिले पनाह
तक़्सीर मेरी, खालिक़-ए-आलम बहल करेआसान मुझ गरीब की मुश्किल अजल करे
सुन कर ज़बाँ से माँ की ये फ़रयाद दर्द-ख़ेज़उस खस्त जाँ के दिल पे ग़म की तेग-ए-तेज़आलम ये था क़रीब, के आँखें हों अश्क-रेज़लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़
सोचा यही, के जान से बेकस गुज़र न जायेनाशाद हम को देख कर माँ और मर न जाये
फिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूरमायूस क्यूं हैं आप? अलम का है क्यूं वफ़ूर?सदमा ये शाक़ आलम-ए-पीरी है ज़रूरलेकिन न दिल से कीजिये सब्र-ओ-क़रार दूर
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.