ग़ज़ल
नज़राने रूह
तेरा बन्दा रहे दिल से यही पैमान रहा,तायरे फ़िक्र तेरे औज से हैरान रहा
क़द्र करना तेरी सीखें यही अरमान रहायही मसला, यही मज़हब यही ईमान रहा
आबरू क्या है तमन्ना-ए-वफ़ा में मरनादीन क्या है किसी कामिल की परस्तिश करना
मुझ से याराने अदम ने ये अगर फ़रमायाहसरत आबाद जहाँ से तुझे क्या हाथ आया
मैं कहूँगा कि बस एक रहबरे कामिल पायाज़िन्दगी की यही दौलत है यही सरमाया
लेके दुनिया से यही महरे वफ़ा आया हूँअपने मोहसिन की ग़ुलामी की सनद लाया हूँ।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.