ग़ज़ल

ज़ुबाँ को बन्द करें या मुझे असीर करें

बृज नारायण चकबस्त · सब कलाम देखें
ज़ुबाँ को बन्द करें या मुझे असीर करेंमेरे ख़याल को बेड़ी पिन्हा नहीं सकते ।
ये कैसी बज़्म है और कैसे इसके साक़ी हैंशराब हाथ में है और पिला नहीं सकते ।
ये बेकसी भी अजब बेकसी है दुनिया मेंकोई सताए हमें हम सता नहीं सकते ।
कशिश वफ़ा की उन्हें खींच लाई आख़िरकारये था रक़ीब को दावा वे आ नहीं सकते ।
जो तू कहे तो शिकायत का ज़िक्र कम कर देंमगर यक़ीं तेरे वादों पै ला नहीं सकते ।
चिराग़ क़ौम का रोशन है अर्श पर दिल केइसे हवा के फ़रिश्ते बुझा नहीं सकते ।
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