ग़ज़ल
दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-इमाँ होना
दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-इमाँ होनाआदमियत यही है और यही इन्साँ होआ
नौ-गिरफ़्तार-ए-बला तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ क्या जानेंकोई नाशाद सिखा दे इन्हें नालाँ होना
रह के दुनिया में यूँ तर्क-ए-हवस की कोशिशजिस तरह् अपने ही साये से गुरेज़ाँ होना
ज़िन्दगी क्या है अनासिर् में ज़हूर्-ए-तर्तीब्मौत क्य है इन्हीं इज्ज़ा का परेशाँ होना
दिल असीरी में भी आज़ाद है आज़ादों कावल्वलों के लिये मुम्किन नहीं ज़िन्दा होना
गुल को पामाल न कर लाल-ओ-गौहर के मालिकहै इसे तुराह-ए-दस्तार-ए-ग़रीबाँ होना
है मेरा ज़ब्त-ए-जुनूँ जोश-ए-जुनूँ से बढ़करनंग है मेरे लिये चाक गरेबाँ होना
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.