ग़ज़ल
वतन का राग
ज़मीन हिन्द की रुतबे में अर्शआला हैये होमरूल की उम्मीद का उजाला है
मिसेज बेसण्ट ने इस आरज़ू को पाला हैफ़क़ीर क़ौम के हैं और ये राग माला है
तलब फ़िज़ूल है काँटे की फूल के बदलेन लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले
वतनपरस्त शहीदों की ख़ाक लाएँगेहम अपनी आँख का सुरमा उसे बनाएँगे
ग़रीब माँ के लिए दर्द दुख उठाएँगेयही पयामे वफ़ा क़ौम को सुनाएँगे
तलब फ़िजूल है काँटे की फूल के बदलेन लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले
हमारे वास्ते ज़ंजीर तौक़ गहना हैवफ़ा के शौक़ में गाँधी ने जिसको पहना है
समझ लिया कि हमें रंजो दर्द सहना हैमगर ज़ुबाँ से कहेंगे वही जो कहना है
तलब फ़िजूल है काँटे की फूल के बदलेन लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले
पिन्हानेवाले अगर बेड़ियाँ पिन्हाएँगेख़ुशी से क़ैद के गोशे को हम बसाएँगे
जो सन्तरी दरे ज़िन्दाँ के सो भी जाएँगेये राग गा के उन्हें नींद से जगाएँगे
तलब फ़िजूल है काँटे की फूल के बदलेन लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले
ज़बाँ को बन्द किया है ये गाफ़िलों को है नाज़ज़रा रगों में लहू का भी देख लें अन्दाज़
रहेगा जान के हमराह दिल का सोज़ गदाज़चिता से आएगी मरने के बाद ये आवाज़
तलब फ़िजूल है काँटे की फूल के बदलेन लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले
यही दुआ है वतन के शकिस्ताहालों कीयही उमंग जवानी के नौनिहालों की
जो रहनुमा है मुहब्बत पै मिटनेवालों कीहमें क़सम है उसी के सफ़ेद बालों की
तलब फ़िजूल है काँटे की फूल के बदलेन लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले
यही पयाम है कोयल का बाग़ के अन्दरइसी हवा में है गंगा का ज़ोर आठ पहर
हिलाले ईद ने दी है यही दिलों को ख़बरपुकारता है हिमाला से अब्र उठ-उठकर
तलब फ़िजूल है काँटे की फूल के बदलेन लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले
बसे हुए हैं मुहब्बत से जिनकी क़ौम के घरवतन का पास है उनको सुहाग से बढ़कर
जो शीरख़्वार हैं हिन्दोस्ताँ के लख़्ते जिगरये माँ के दूध से लिक्खा है उनके सीने पर
तलब फ़िजूल है काँटे की फूल के बदलेन लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.