ग़ज़ल
फ़ना नहीं है मुहब्बत के रंगो बू के लिए
फ़ना नहीं है मुहब्बत के रंगो बू के लिएबहार आलमे फ़ानी रहे रहे न रहे ।
जुनूने हुब्बे वतन का मज़ा शबाब में हैलहू में फिर ये रवानी रहे रहे न रहे ।
रहेगी आबोहवा में ख़याल की बिजलीये मुश्त ख़ाक है फ़ानी रहे रहे न रहे ।
जो दिल में ज़ख़्म लगे हैं वो ख़ुद पुकारेंगेज़बाँ की सैफ़ बयानी रहे रहे न रहे ।
मिटा रहा है ज़माना वतन के मन्दिर कोये मर मिटों की निशानी रहे रहे न रहे ।
दिलों में आग लगे ये वफ़ा का जौहर हैये जमाँ ख़र्च ज़बानी रहे रहे न रहे ।
जो माँगना हो अभी माँग लो वतन के लिएये आरज़ू की जवानी रहे रहे न रहे ।
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