ग़ज़ल
राम और कौशल्या की बातचीत का मंज़र
रुख़्सत हुआ वो बाप से लेकर ख़ुदा का नामराह-ए-वफ़ा की मंज़िल-ए-अव्वल हुई तमाममंज़ूर था जो मां की ज़ियारत का इंतिज़ामदामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलाम
इज़हार-ए-बे-कसी से सितम होगा और भीदेखा हमें उदास तो ग़म होगा और भी
दिल को संभालता हुआ आख़िर वो नौनिहालख़ामोश मां के पास गया सूरत-ए-ख़यालदेखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हालसकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलाल
तन में लहू का नाम नहीं ज़र्द रंग हैगोया बशर नहीं कोई तस्वीर-ए-संग हैक्या जाने किस ख़याल में गुम थी वो बे-गुनाहनूर-ए-नज़र ये दीदा-ए-हसरत से की निगाह
जुम्बिश हुई लबों को भरी एक सर्द आहली गोशा-हा-ए-चश्म से अश्कों ने रुख़ की राह
चेहरे का रंग हालत-ए-दिल खोलने लगाहर मू-ए-तन ज़बां की तरह बोलने लगा
आख़िर असीर-ए-यास का क़ुफ़्ल-ए-दहन खुलाअफ़्साना-ए-शदाइद-ए-रंज-ओ-मेहन खुलाइक दफ़्तर-ए-मज़ालिम-ए-चर्ख़-ए-कुहन खुलावा था दहान-ए-ज़ख़्म कि बाब-ए-सुख़न खुला
दर्द-ए-दिल-ए-ग़रीब जो सर्फ़-ए-बयां हुआख़ून-ए-जिगर का रंग सुख़न से अयां हुआ
रो कर कहा ख़मोश खड़े क्यूं हो मेरी जांमैं जानती हूं जिस लिए आये हो तुम यहांसबकी ख़ुशी यही है तो सहरा को हो रवांलेकिन मैं अपने मुंह से न हरगिज़ कहूंगी हां
किस तरह बन में आँखों के तारे को भेज दूँजोगी बनाके राज-दुलारे को भेज दूं
दुनिया का हो गया है ये कैसा लहू सपीदअंधा किये हुए है ज़र-ओ-माल की उमीदअंजाम क्या हो कोई नहीं जानता ये भेदसोचे बशर तो जिस्म हो लर्ज़ां मिसाल-ए-बीद
लिक्खी है क्या हयात-ए-अबद इन के वास्तेफैला रहे हैं जाल ये किस दिन के वास्ते
लेती किसी फ़क़ीर के घर में अगर जनमहोते न मेरी जान को सामान ये बहमडसता न साँप बन के मुझे शौकत-ओ-हशमतुम मेरे लाल थे मुझे किस सल्तनत से कम
मैं ख़ुश हूं फूंक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज कोतुम ही नहीं तो आग लगा दूंगी राज को
किन किन रियाज़तों से गुज़ारे हैं माह-ओ-सालदेखी तुम्हारी शक्ल जब ऐ मेरे नौनिहालपूरा हुआ जो ब्याह का अरमान था कमालआफ़त ये आयी मुझ पे हुए जब सफ़ेद बाल
छटती हूं उन से जोग लिया जिन के वास्तेक्या सब किया था मैंने इसी दिन के वास्ते
ऐसे भी ना-मुराद बहुत आएंगे नज़रघर जिनके बे-चराग़ रहे आह उम्र भररहता मिरा भी नख़्ल-ए-तमन्ना जो बे-समरये जा-ए-सब्र थी कि दुआ में नहीं असर
लेकिन यहां तो बनके मुक़द्दर बिगड़ गयाफल फूल ला के बाग़-ए-तमन्ना उजड़ गया
सरज़द हुए थे मुझ से ख़ुदा जाने क्या गुनाहमंजधार में जो यूं मिरी कश्ती हुई तबाहआती नज़र नहीं कोई अम्न-ओ-अमां की राहअब यां से कूच हो तो अदम में मिले पनाह
तक़्सीर मेरी ख़ालिक़-ए-आलम बहल करेआसान मुझ ग़रीब की मुश्किल अजल करेसुन कर ज़बां से मां की ये फ़रियाद-ए-दर्द-ख़ेज़उस ख़स्ता-जां के दिल पे चली ग़म की तेग़-ए-तेज़
आलम ये था क़रीब कि आंखें हों अश्क-रेज़लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़
सोचा यही कि जान से बेकस गुज़र न जाएनाशाद हम को देख के मां और मर न जाएफिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूरमायूस क्यूं हैं आप अलम का है क्यूं वफ़ूर
सदमा ये शाक़ आलम-ए-पीरी में है ज़रूरलेकिन न दिल से कीजिए सब्र-ओ-क़रार दूरशायद ख़िज़ां से शक्ल अयां हो बहार कीकुछ मस्लहत इसी में हो पर्वरदिगार की
ये ज'अल ये फ़रेब ये साज़िश ये शोर-ओ-शरहोना जो है सब उसके बहाने हैं सर-ब-सरअस्बाब-ए-ज़ाहिरी में न इन पर करो नज़रक्या जाने क्या है पर्दा-ए-क़ुदरत में जल्वा-गर
ख़ास उसकी मस्लहत कोई पहचानता नहींमंज़ूर क्या उसे है कोई जानता नहीं
राहत हो या कि रंज ख़ुशी हो कि इंतिशारवाजिब हर एक रंग में है शुक्र-ए-किर्दगारतुम ही नहीं हो कुश्ता-ए-नैरंग-ए-रोज़गारमातम-कदे में दहर के लाखों हैं सोगवार
सख़्ती सही नहीं कि उठायी कड़ी नहींदुनिया में क्या किसी पे मुसीबत पड़ी नहीं
देखे हैं इससे बढ़ के ज़माने ने इंक़लाबजिनसे कि ब-गुनाहों की उम्रें हुईं ख़राबसोज़-ए-दरूं से क़ल्ब ओ जिगर हो गये कबाबपीरी मिटी किसी की किसी का मिटा शबाब
कुछ बन नहीं पड़ा जो नसीबे बिगड़ गयेवो बिजलियां गिरीं कि भरे घर उजड़ गये
मां बाप मुंह ही देखते थे जिनका हर घड़ीक़ाएम थीं जिनके दम से उमीदें बड़ी बड़ीदामन पे जिनके गर्द भी उड़ कर नहीं पड़ीमारी न जिनको ख़्वाब में भी फूल की छड़ी
महरूम जब वो गुल हुए रंग-ए-हयात सेउनको जला के ख़ाक किया अपने हात से
कहते थे लोग देख के मां बाप का मलालइन बे-कसों की जान का बचना है अब मुहालहै किब्रिया की शान गुज़रते ही माह-ओ-सालख़ुद दिल से दर्द-ए-हिज्र का मिटता गया ख़याल
हां कुछ दिनों तो नौहा-ओ-मातम हुआ कियाआख़िर को रोके बैठ रहे और क्या किया
पड़ता है जिस ग़रीब पे रंज-ओ-मेहन का बारकरता है उसको सब्र अता आप किर्दगारमायूस हो के होते हैं इंसां गुनाहगारये जानते नहीं वो है दाना-ए-रोज़गार
इंसान उसकी राह में साबित-क़दम रहेगर्दन वही है अम्र-ए-रज़ा में जो ख़म रहे
और आपको तो कुछ भी नहीं रंज का मक़ामबाद-ए-सफ़र वतन में हम आएंगे शाद-कामहोते हैं बात करने में चौदह बरस तमामक़ाएम उमीद ही से है दुनिया है जिसका नाम
और यूं कहीं भी रंज-ओ-बला से मफ़र नहींक्या होगा दो घड़ी में किसी को ख़बर नहीं
अक्सर रियाज़ करते हैं फूलों पे बाग़बांहै दिन की धूप रात की शबनम उन्हें गिरांलेकिन जो रंग बाग़ बदलता है ना-गहांवो गुल हज़ार पर्दों में जाते हैं राएगां
रखते हैं जो अज़ीज़ उन्हें अपनी जां की तरहमिलते हैं दस्त-ए-यास वो बर्ग-ए-ख़िज़ां की तरह
लेकिन जो फूल खिलते हैं सहरा में बे-शुमारमौक़ूफ़ कुछ रियाज़ पे उनकी नहीं बहारदेखो ये क़ुदरत-ए-चमन-आरा-ए-रोज़गारवो अब्र-ओ-बाद ओ बर्फ़ में रहते हैं बरक़रार
होता है उन पे फ़ज़्ल जो रब्ब-ए-करीम कामौज-ए-सुमूम बनती है झोंका नसीम का
अपनी निगाह है करम-ए-कारसाज़ परसहरा चमन बनेगा वो है मेहरबां अगरजंगल हो या पहाड़ सफ़र हो कि हो हज़ररहता नहीं वो हाल से बंदे के बे-ख़बर
उसका करम शरीक अगर है तो ग़म नहींदामान-ए-दश्त दामन-ए-मादर से कम नहीं
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