ग़ज़ल
दाढ़ी के रखैयन की दाढ़ी सी रहत छाती
दाढ़ी के रखैयन की दाढ़ी सी रहत छातीबाढ़ी मरजाद जसहद्द हिंदुवाने कीकढ़ी गईं रैयत के मन की कसक सबमिटि गईं ठसक तमाम तुकराने कीभूषण भनत दिल्लीपति दिल धक धकसुनि सुनि धाक सिवराज मरदाने कीमोटी भई चंडी,बिन चोटी के चबाये सीसखोटी भई अकल चकत्ता के घराने की
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