ग़ज़ल
दारा की न दौर यह,रार नहीं खजुबे की
दारा की न दौर यह, रार नहीं खजुबे की,बाँधिबो नहीं है कैंधो मीर सहवाल को.मठ विश्वनाथ को, न बास ग्राम गोकुल को,देवी को न देहरा, न मंदिर गोपाल को.गाढ़े गढ़ लीन्हें अरु बैरी कतलाम कीन्हें,ठौर ठौर हासिल उगाहत हैं साल को.बूड़ति है दिल्ली सो सँभारे क्यों न दिल्लीपति,धक्का आनि लाग्यौ सिवराज महाकाल को.
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