ग़ज़ल
फिर आई फस्ले गुल फिर जख़्मदह रह-रह के पकते हैं
फिर आई फ़स्ले गुल फिर जख़्मदह रह-रह के पकते हैं ।मेरे दागे जिगर पर सूरते लाला लहकते हैं ।
नसीहत है अबस नासेह बयाँ नाहक ही बकते हैं ।जो बहके दुख्तेरज से हैं वह कब इनसे बहकते हैं ?
कोई जाकर कहो ये आख़िरी पैगाम उस बुत से ।अरे आ जा अभी दम तन में बाक़ी है सिसकते हैं ।
न बोसा लेने देते हैं न लगते हैं गले मेरे ।अभी कम-उम्र हैं हर बात पर मुझ से झिझकते हैं ।
व गैरों को अदा से कत्ल जब बेबाक करते हैं ।तो उसकी तेग़ को हम आह किस हैरत से तकते हैं ।
उड़ा लाए हो यह तर्जे सखुन किस से बताओ तो ।दमे तक़दीर गोया बाग़ में बुलबुल चहकते हैं ।
'रसा' की है तलाशे यार में यह दश्त-पैमाई ।कि मिस्ले शीशा मेरे पाँव के छाले झलकते हैं ।
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