ग़ज़ल

ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वह बाहर निकलते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र · सब कलाम देखें
ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वह बाहर निकलते हैं ।अभी से कुछ दिल मुज़्तर पर अपने तीर चलते हैं ।
ज़रा देखो तो ऐ अहले सखुन ज़ोरे सनाअत को ।नई बंदिश है मजमूँ नूर के साँचें में ढलते हैं ।
बुरा हो इश्क का यह हाल है अब तेरी फ़ुर्कत में ।कि चश्मे खूँ चकाँ से लख़्ते दिल पैहम निकलते हैं ।
हिला देंगे अभी हे संगे दिल तेरे कलेजे को ।हमारी आहे आतिश-बार से पत्थर पिघलते हैं ।
तेरा उभरा हुआ सीना जो हमको याद आता है ।तो ऐ रश्के परी पहरों कफ़े अफ़सोस मलते हैं ।
किसी पहलू नहीं चैन आता है उश्शाक को तेरे ।तड़फते हैं फ़ुगाँ करते हैं औ करवट बदलते हैं ।
'रसा' हाजत नहीं कुछ रौशनी की कुंजे मर्कद में ।बजाये शमा याँ दागे जिगर हर वक़्त जलते हैं ।
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