ग़ज़ल

आ गई सर पर कज़ा लो सारा सामाँ रह गया

भारतेंदु हरिश्चंद्र · सब कलाम देखें
आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया ।ऐ फ़लक क्या-क्या हमारे दिल में अरमाँ रह गया ।
बाग़बाँ है चार दिन की बाग़े आलम में बहार ।फूल सब मुरझा गए खाली बियाबाँ रह गया ।
इतना एहसाँ और कर लिल्लाह ऐ दस्ते जनूँ ।बाक़ी गर्दन में फ़कत तारे गिरेबाँ रह गया ।
याद आई जब तुम्हारे रूप रौशन की चमक ।मैं सरासर सूरते आईना हैराँ रह गया ।
ले चले दो फूल भी इस बाग़े आलम से न हम ।वक़्त रेहलत हैफ़ है खाली हि दामाँ रह गया ।
मर गए हम पर न आए तुम ख़बर को ऐ सनम ।हौसला सब दिल का दिल ही में मेरी जाँ रह गया ।
नातवानी ने दिखाया ज़ोर अपना ऐ 'रसा' ।सूरते नक्शे क़दम मैं बस नुमायाँ रह गया ।
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