ग़ज़ल

बँसुरिआ मेरे बैर परी

भारतेंदु हरिश्चंद्र · सब कलाम देखें
बँसुरिआ मेरे बैर परी।छिनहूँ रहन देति नहिं घर में, मेरी बुद्धि हरी।बेनु-बंस की यह प्रभुताई बिधि हर सुमति छरी।’हरीचंद’ मोहन बस कीनो, बिरहिन ताप करी॥
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