ग़ज़ल

बुत-ए-काफ़िर जो तू मुझ से ख़फ़ा है

भारतेंदु हरिश्चंद्र · सब कलाम देखें
बुत-ए-काफ़िर जो तू मुझ से ख़फ़ा होनहीं कुछ ख़ौफ़ मेरा भी ख़ुदा है
ये दर-पर्दा सितारों की सदा हैगली-कूचा में गर कहिए बजा है
रक़ीबों में वो होंगे सुर्ख़-रू आजहमारे क़त्ल का बेड़ा लिया है
यही है तार उस मुतरिब का हर रोज़नया इक राग ला कर छेड़ता है
शुनीदा कै बवद मानिंद-ए-दीदतुझे देखा है हूरों को सुना है
पहुँचता हूँ जो मैं हर रोज़ जा करतो कहते हैं ग़ज़ब तू भी 'रसा' है
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