ग़ज़ल

चने का लटका

भारतेंदु हरिश्चंद्र · सब कलाम देखें
चना जोर गरम।चना बनावैं घासी राम। जिनकी झोली में दूकान।।चना चुरमुर-चुरमुर बोलै। बाबू खाने को मुँह खोलै।।चना खावैं तोकी मैना। बोलैं अच्छा बना चबैना।।चना खाएँ गफूरन, मुन्ना। बोलैं और नहिं कुछ सुन्ना।।चना खाते सब बंगाली। जिनकी धोती ढीली-ढाली।।चना खाते मियाँ जुलाहे। दाढ़ी हिलती गाहे-बगाहे।।चना हाकिम सब खा जाते। सब पर दूना टैक्स लगाते।।चना जोर गरम।।
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