ग़ज़ल

घन गरजे

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' · सब कलाम देखें
सखि, वन-वन घन गरजे!श्रवण निनादा-मगनमन उन्मनप्राण-पवन-कणलरजे!
परम अगम प्रियतमा गगन की शंख-ध्वनि आईमंथर गति रति चरण चारू की चाप गगन में छाईअंबर कंपित पवन संचारित संसृति अति सरसाईमंद्र-मंद्र आगमन सूचना हिय में आन समाईक्षण में प्राण उन्मादीकौन इन्हें अब बरजे?
मेरा गगन और मम आँगन आज सिहर कर काँपामेरी यह आल्हाद बिथा सखि, बना असीम अमापाआवेंगे वे चरण जिन्होंने इस त्रिलोक को नापासखि मैंने ऐसा आमंत्रण-श्रुति स्वर कब आलापा?लगता है मानो ये बादल कुछ यों ही हैं तरजे!
श्रवण-निनाद-मगनमन-उन्मनप्राण-पवन-कणलरजे!
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