ग़ज़ल

हम अनिकेतन

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' · सब कलाम देखें
हम निकेतन, हम अनिकेतनहम तो रमते राम हमारा क्या घर, क्या दर, कैसा वेतन?
अब तक इतनी योंही काटी, अब क्या सीखें नव परिपाटीकौन बनाए आज घरौंदा हाथों चुन-चुन कंकड़ माटीठाट फकीराना है अपना वाघांबर सोहे अपने तन?
देखे महल, झोंपड़े देखे, देखे हास-विलास मज़े केसंग्रह के सब विग्रह देखे, जँचे नहीं कुछ अपने लेखेलालच लगा कभी पर हिय में मच न सका शोणित-उद्वेलन!
हम जो भटके अब तक दर-दर, अब क्या खाक बनाएँगे घरहमने देखा सदन बने हैं लोगों का अपनापन लेकरहम क्यों सने ईंट-गारे में हम क्यों बने व्यर्थ में बेमन?
ठहरे अगर किसीके दर पर कुछ शरमाकर कुछ सकुचाकरतो दरबान कह उठा, बाबा, आगे जो देखा कोई घरहम रमता बनकर बिचरे पर हमें भिक्षु समझे जग के जन!हम अनिकेतन!
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