ग़ज़ल
सदा चाँदनी
कुछ धूमिल-सी कुछ उज्ज्वल-सी झिलमिल शिशिर-चाँदनी छाईमेरे कारा के आँगन में उमड़ पड़ी यह अमल जुन्हाई।
अरे आज चाँदी बरसी है मेरे इस सूने आँगन मेंजिससे चमक आ गई है इन मेरे भूलुंठित कण-कण मेंउठ आई है एक पुलक मृदु मुझ बंदी के भी तन-मन मेंभावों की स्वप्निल फुहियों में मेरी भी कल्पना नहाई,
मैं हूँ बंद सात तालों में किंतु मुक्त है चंद्र गगन मेंमुक्ति बह रही है क्षण-क्षण इस मंद प्रवाहित शिशर-व्यजन मेंऔर कहाँ कब मानी मैंने बंधन-सीमा अपने मन में!जन-जन-गण का मुक्ति-संदेसा ले आई चंद्रिका-जुन्हाई!
मैं निज काल कोठरी में हूँ औ' चाँदनी खिली है बाहरइधर अंधेरा फैल रहा है फैला उधर प्रकाश अमाहरक्यों मानूँ कि ध्वान्त अविजित जब है विस्तृत गगन उजागरलो मेरे खपरैलों से भी एक किरण हँसती छन आई!
मास वर्ष की गिनती क्यों हो वहाँ जहाँ मन्वंतर जूझेंयुग परिवर्तन करने वाले जीवन वर्षों को क्यों बूझेंहम विद्रोही, कहो हमें क्यों अपने मग के कंटक सूझेंहमको चलना है, हमको क्या, हो अंधियारी या कि जुन्हाई!कुछ धूमिल-सी कुछ उज्ज्वल-सी हिय में सदा चाँदनी छाई!
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.