ग़ज़ल

एक आरज़ू

अल्लामा इक़बाल · सब कलाम देखें
दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रबक्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया होशोरिश से भागता हूँ दिल ढूँढता है मेराऐसा सुकूत जिस पर तक़रीर भी फ़िदा होमरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरीदामन में कोह के इक छोटा सा झोंपड़ा होआज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत में दिन गुज़ारूँदुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया होलज़्ज़त सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों मेंचश्मे की शोरिशों में बाजा सा बज रहा होगुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी कासाग़र ज़रा सा गोया मुझ को जहाँ-नुमा होहो हाथ का सिरहाना सब्ज़े का हो बिछौनाशरमाए जिस से जल्वत ख़ल्वत में वो अदा होमानूस इस क़दर हो सूरत से मेरी बुलबुलनन्हे से दिल में उस के खटका न कुछ मिरा होसफ़ बाँधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे होंनद्दी का साफ़ पानी तस्वीर ले रहा होहो दिल-फ़रेब ऐसा कोहसार का नज़ारापानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता होआग़ोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सब्ज़ाफिर फिर के झाड़ियों में पानी चमक रहा होपानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनीजैसे हसीन कोई आईना देखता होमेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन कोसुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा होरातों को चलने वाले रह जाएँ थक के जिस दमउम्मीद उन की मेरा टूटा हुआ दिया होबिजली चमक के उन को कुटिया मिरी दिखा देजब आसमाँ पे हर सू बादल घिरा हुआ होपिछले पहर की कोयल वो सुब्ह की मोअज़्ज़िनमैं उस का हम-नवा हूँ वो मेरी हम-नवा होकानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँरौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा होफूलों को आए जिस दम शबनम वज़ू करानेरोना मिरा वज़ू हो नाला मिरी दुआ होइस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नालेतारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा दिरा होहर दर्दमंद दिल को रोना मिरा रुला देबेहोश जो पड़े हैं शायद उन्हें जगा दे
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