ग़ज़ल

ख़ुदा के बन्दे तो हैं हज़ारों बनो‌ में फिरते हैं मारे-मारे

अल्लामा इक़बाल · सब कलाम देखें
ज़माना आया है बेहिजाबी का, आम दीदार-ए-यार होगासुकूत था परदादार जिसका वो राज़ अब आशकार होगा ।
गुज़र गया अब वो दौर साक़ी, कि छुप के पीते थे पीने वालेबनेगा सारा जहां मयख़ाना हर कोई बादह्ख़ार होगा
कभी जो आवारा-ए-जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसेंगेबरहना-पाई वही रहेगी, मगर नया ख़ारज़ार होगा ।
सुना दिया गोश-ए-मुन्तज़िर को हिजाज़ का ख़ामोशी ने आखिरजो अहद सहराइओं से बाँधा गया था फिर उस्तवार होगा ।
निकल के सहरा से जिसने रोमां की सल्तनत को उलट दिया थासुना है ये क़ुदसियों से मैने, वो शेर फ़िर होशियार होगा ।
किया मेरा तज़किरा जो साक़ी ने बादख़ारों की अंजुमन मेंपीर-ए-मयख़ाना सुन के कहने लगा, मुंहफट है ख़ार होगा ।
दियार-ए-मग़रिब के रहने वालों, ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं हैखरा जिसे तुम समझ रहे हो, ओ अब ज़र-ए-कम अयार होगा ।
तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुद्कुशी करेगीजो शाख़े-नाज़ुक़ पे आशियाना बनेगा, नापाएदार होगा ।
सफ़ीना-ए-बर्ग-ए-गुल बना लेगा काफ़िला नूर-ए-नातवाँ काहज़ार मौजों की हो कशाकश मगर ये दरिया से पार होगा ।
चमन में लाला दिखाता फिरता है दाग़ अपना कली-कली कोये जानता है कि इस दिखावे से दिलजलों में शुमार होगा ।
जो एक था ऐ निगाह तूने हमें हज़ार करके दिखायायही अगर कैफ़ियत हे तेरी तो किसे ऐतबार होगा ।
कहा जो कुमरी से मैने एक दिन यहाँ के आज़ाद पाबकिल हैंतो गुन्चे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा ।
ख़ुदा के बन्दे तो हैं हज़ारों बनो‌ में फिरते हैं मारे-मारेमैं उसका बन्दा बनूँगा जिसको ख़ुदा के बन्दों से प्यार होगा ।
ये रस्म-ए-बज़्म-ए-फ़ना है ऐ दिल, गुनाह है जुम्बिश-ए-नज़र कीरहेगी क्या आबरु हमारी जो तू यहाँ बेक़रार होगा ।
मैं जुल्मत-ए-शब में लेके निकलूंगा अपने दरमांदा कारवां कोशरर फसां होगी आह मेरी, नफ़स मेरा शोला बार होगा ।
नहीं है ग़ैर जुनूत कुछ भी मुद्दआ तेरी ज़िंदगी कातो इक नफ़स में मिटना तुझे मिसाल-ए-शरार होगा ।
न पूछ इक़बाल का ठिकाना, अभी वही कैफ़ियत है उसकीकहीं सर-ए-रहगुज़ार बैठा सितमकश-ए-इंतिज़ार होगा ।
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