ग़ज़ल
आम मशरिक़ के मुसलमानों का दिल मगरिब में जा अटका है
आम मशरिक़ के मुसलमानों का दिल मगरिब में जा अटका हैवहाँ कुंतर सब बिल्लोरी है, यहाँ एक पुराना मटका है
इस दौर में सब मिट जायेंगे, हाँ बाक़ी वो रह जायेगाजो क़ायम अपनी राह पे है, और पक्का अपनी हट का हे
अए शैख़-ओ-ब्रह्मन सुनते हो क्या अह्ल-ए-बसीरत कहते हैंगर्दों ने कितनी बुलंदी से उन क़ौमों को दे पटका है
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