ग़ज़ल
ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं
ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहींतेरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं
हर इक मुक़ाम से आगे मुक़ाम है तेराहयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं
रंगो में गर्दिश-ए-ख़ूँ है अगर तो क्या हासिलहयात सोज़-ए-जिगर के सिवा कुछ और नहीं
उरूस-ए-लाला मुनासिब नहीं है मुझसे हिजाबकि मैं नसीम-ए-सहर के सिवा कुछ और नहीं
जिसे क़साद समझते हैं ताजरन-ए-फ़िरन्गवो शय मता-ए-हुनर के सिवा कुछ् और नहीं
गिराँबहा है तो हिफ़्ज़-ए-ख़ुदी से है वरनागौहर में आब-ए-गौहर के सिवा कुछ और नहीं
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