ग़ज़ल
अजब वाइज़ की दींदारी है या रब
अजब वाइज़ की दीन-दारी है या रबअदावत है इसे सारे जहाँ से
कोई अब तक न ये समझा कि इंसाँकहाँ जाता है आता है कहाँ से
वहीं से रात को ज़ुल्मत मिली हैचमक तारों ने पाई है जहाँ से
हम अपनी दर्दमंदी का फ़सानासुना करते हैं अपने राज़दाँ से
बड़ी बारीक हैं वाइज़ की चालेंलरज़ जाता है आवाज़-ए-अज़ाँ से
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