ग़ज़ल

अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैं

अल्लामा इक़बाल · सब कलाम देखें
अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैंये आशिक़ कौन-सी बस्ती के यारब रहने वाले हैं
इलाजे-दर्द में भी दर्द की लज़्ज़त पे मरता हूँजो थे छालों में काँटे नोक-ए-सोज़ाँ से निकाले हैं
फला फूला रहे यारब चमन मेरी उम्मीदों काजिगर का ख़ून दे दे के ये बूटे मैने पाले हैं
रुलाती है मुझे रातों को ख़ामोशी सितारों कीनिराला इश्क़ है मेरा निराले मेरे नाले हैं
न पूछो मुझसे लज़्ज़त ख़ानुमाँ-बरबाद रहने कीनशेमन सैंकड़ों मैंने बनाकर फूँक डाले हैं
नहीं बेग़ानगी अच्छी रफ़ीक़े-राहे-मंज़िल सेठहर जा ऐ शरर हम भी तो आख़िर मिटने वाले हैं
उमीदे-हूर ने सब कुछ सिखा रक्खा है वाइज़ कोये हज़रत देखने में सीधे-सादे भोले-भाले हैं
मेरे अश्आर ऐ इक़बाल क्यों प्यारे न हों मुझकोमेरे टूटे हुए दिल के ये दर्द-अंगेज़ नाले हैं
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