ग़ज़ल
अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन और
अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन औरउस कू-ए-मलामत में गुजरते कोई दिन और
रातों के तेरी यादों के खुर्शीद उभरतेआँखों में सितारे से उभरते कोई दिन और
हमने तुझे देखा तो किसी और को ना देखाए काश तेरे बाद गुजरते कोई दिन और
राहत थी बहुत रंज में हम गमतलबों कोतुम और बिगड़ते तो संवरते कोई दिन और
गो तर्के-तअल्लुक था मगर जाँ पे बनी थीमरते जो तुझे याद ना करते कोई दिन और
उस शहरे-तमन्ना से फ़राज़ आये ही क्यों थेये हाल अगर था तो ठहरते कोई दिन और
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