ग़ज़ल
क्या ऐसे कम-सुख़न से कोई गुफ़्तगू करे
क्या ऐसे कम-सुख़न से कोई गुफ़्तगू करेजो मुस्तक़िल सुकूत से दिल को लहू करे
अब तो हमें भी तर्क-ए-मरासिम का दुख नहींपर दिल ये चाहता है के आगाज़ तू करे
तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िन्दगीखुद को गँवा के कौन तेरी जुस्तजू करे
अब तो ये आरज़ू है कि वो जख़्म खाइयेता-ज़िन्दगी ये दिल न कोई आरज़ू करे
तुझ को भुला के दिल है वो शर्मिंदा-ए-नज़रअब कोई हादिसा ही तेरे रु-ब-रू करे
चुपचाप अपनी आग में जलते रहो "फ़राज़"दुनिया तो अर्ज़े--हाल से बे-आबरू करे
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh