ग़ज़ल

अब नये साल की मोहलत नहीं मिलने वाली

अहमद फ़राज़ · सब कलाम देखें
अब नये साल की मोहलत नहीं मिलने वालीआ चुके अब तो शब-ओ-रोज़ अज़ाबों वाले
अब तो सब दश्ना-ओ-ख़ंज़र की ज़ुबाँ बोलते हैंअब कहाँ लोग मुहब्बत के निसाबों वाले
ज़िन्दा रहने की तमन्ना हो तो हो जाते हैंफ़ाख़्ताओं के भी किरदार उक़ाबों वाले
न मेरे ज़ख़्म खिले हैं न तेरा रंग-ए-हिनामौसम आये ही नहीं अब के गुलाबों वाले
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