ग़ज़ल
क़ुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता
कुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जातावो शख़्स कोई फ़ैसला कर भी नहीं जाता
आँखें हैं के खाली नहीं रहती हैं लहू सेऔर ज़ख्म-ए-जुदाई है के भर भी नहीं जाता
वो राहत-ए-जान है इस दरबदरी मेंऐसा है के अब ध्यान उधर भी नहीं जाता
हम दोहरी अज़ीयत के गिरफ़्तार मुसाफ़िरपाऔं भी हैं शील शौक़-ए-सफ़र भी नहीं जाता
दिल को तेरी चाहत पर भरोसा भी बहुत हैऔर तुझसे बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता
पागल होते हो 'फ़राज़' उससे मिले क्याइतनी सी ख़ुशी से कोई मर भी नहीं जाता
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