ग़ज़ल
अव्वल अव्वल की दोस्ती है अभी
अव्वल अव्वल की दोस्ती है अभीइक ग़ज़ल है कि हो रही है अभी
मैं भी शहरे-वफ़ा में नौवारिदवो भी रुक रुक के चल रही है अभी
मैं भी ऐसा कहाँ का ज़ूद शनासवो भी लगता है सोचती है अभी
दिल की वारफ़तगी है अपनी जगहफिर भी कुछ एहतियात सी है अभी
गरचे पहला सा इज्तिनाब नहींफिर भी कम कम सुपुर्दगी है अभी
कैसा मौसम है कुछ नहीं खुलताबूंदा-बांदी भी धूप भी है अभी
ख़ुद-कलामी में कब ये नशा थाजिस तरह रु-ब-रू कोई है अभी
क़ुरबतें लाख खूबसूरत होंदूरियों में भी दिलकशी है अभी
फ़सले-गुल में बहार पहला गुलाबकिस की ज़ुल्फ़ों में टांकती है अभी
सुबह नारंज के शिगूफ़ों कीकिसको सौगात भेजती है अभी
रात किस माह -वश की चाहत मेंशब्नमिस्तान सजा रही है अभी
मैं भी किस वादी-ए-ख़याल में थाबर्फ़ सी दिल पे गिर रही है अभी
मैं तो समझा था भर चुके सब ज़ख़्मदाग़ शायद कोई कोई है अभी
दूर देशों से काले कोसों सेकोई आवाज़ आ रही है अभी
ज़िन्दगी कु-ए-ना-मुरादी सेकिसको मुड़ मुड़ के देखती है अभी
इस क़दर खीच गयी है जान की कमानऐसा लगता है टूटती है अभी
ऐसा लगता है ख़ल्वत-ए-जान मेंवो जो इक शख़्स था वोही है अभी
मुद्दतें हो गईं 'फ़राज़' मगरवो जो दीवानगी थी, वही है अभी
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