ग़ज़ल

क्या रुख़्सत-ए-यार की घड़ी थी

अहमद फ़राज़ · सब कलाम देखें
क्या रुख़्सत-ए-यार की घड़ी थीहँसती हुई रात रो पड़ी थी
हम ख़ुद ही हुए तबाह वरनादुनिया को हमारी क्या पड़ी थी
ये ज़ख़्म हैं उन दिनों की यादेंजब आप से दोस्ती बड़ी थी
जाते तो किधर को तेरे वहशीज़न्जीर-ए-जुनूँ कड़ी पड़ी थी
ग़म थे कि "फ़राज़" आँधियाँ थीदिल था कि "फ़राज़" पन्खुदई थी
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